संचय की परिभाषा, अर्थ, विशेषताएं, उदाहरण, प्रकार, नियम | sanchay

संचय का अर्थ

हमारा भविष्य अनिश्चित है। भविष्य में बहुत सी आकस्मिकताएँ एवं विभिन्न आवश्यकताए होती हैं। कभी-कभी हम कुछ सम्भावित हानियों/व्ययों का अनुमान लगाते हैं, जिनको हमने भविष्य में वहन करना है। इसके लिए हम अपनी वर्तमान आय में से कुछ धन बचा लेते हैं।
यदि सम्भावित घटना घटित होती है तो हम इस बचाई गई राशि का उपयोग कर सकते हैं। माना आपके पिता ₹ 20,000 मासिक कमाते हैं तथा वह किसी अप्रत्याशित घटना के लिए कुछ धन बचाकर नहीं रखते हैं। माना कि महीने के मध्य में आप बीमार हो जाते हैं तो आपके पिता आपके इलाज के विभिन्न खर्चा की किस प्रकार से व्यवस्था करेंगे? निश्चित है कि वह अपने मित्रों, सगेसंबंधियों आदि से पैसा मांगेगे। यदि वे आपके पिता की सहायता नहीं करते हैं तो क्या होगा? यदि आपके पिता ने इस प्रकार की अप्रत्याशित घटनाओं के लिए कुछ धन बचाया होता तो उन्हें इस प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। इस प्रकार से जो राशि हम अपनी वर्तमान आय में से भविष्य की असंभावित घटनाओं का भुगतान करने के लिए एक ओर बचाकर रखते हैं, संचय कहलाता है। भविष्य अनिश्चित हैं, व्यवसाय में कई ऐसी घटनाएं हैं जो घटित हो सकती हैं जिनकी पहले से कोई संभावना नहीं थी। इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से धन की व्यवस्था करना आवश्यक होता है। वर्ष में कुल अर्जित आय में से कुछ राशि को संचय के रूप में अलग रखने की आवश्यकता होती है।
संचय वह राशि है जिसे लाभ में से बचा कर एक ओर रख दिया जाता है। यह लाभ अथवा संचित का विनियोजन होता है जो व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को सढ़ करने के लिए होता है। यह लाभों के विरूद्ध कोई अधिभार नहीं है। यह किसी देनदारी अथवा सम्पत्ति पर ह्रास को पूरा करने के लिए नहीं होता। संचय के उदाहरण हैं : सामान्य संचय, विस्तार के लिए संचय, लाभांश समानीकरण के लिए संचय, प्रतिस्थापन की लागत में वृद्धि के लिए संचय आदि।

संचय के प्रकार

कभी-कभी व्यवसाय को, भविष्य की ज्ञात अथवा अज्ञात आकस्मिकताओं/आपात स्थितियों की सम्भाव्यता का अनुमान लगाना होता है। इसके भुगतान के लिए, वह लाभों एवं अन्य आधिक्यों के एक भाग को बचाकर रख लेता है, जिसे संचय कहते हैं। संचय लाभ का विनियोजन होता है न कि लाभ पर अधिभार क्योंकि यह किसी ज्ञात देयता के भुगतान करने अथवा सम्पत्ति के मूल्य में आए ह्रास को पूरा करने के लिए नहीं होता है। यह लाभ का वह भाग है जिसे एक ओर बचाकर रख लिया जाता है, जिससे अप्रत्याशित देनदारी अथवा भविष्य की आपातकालीन स्थिति से निपटा जा सके। इसका सृजन लाभ-हानि विनियोजन खाते के नाम में प्रविष्टि करके किया जाता है। इसका सजन उसी स्थिति में हो सकता है जबकि व्यवसाय को लाभ हो रहा हो। इसे सामान्यतः स्थिति विवरण के देयता पक्ष में दर्शाया जाता है।

संचय निम्नलिखित वर्गों में बांटे जा सकते हैं :-
  • सामान्य संचय
  • पूंजीगत संचय
  • गुप्त संचय
  • आयगत संचय
  • विशिष्ट संचय
  • संचित कोष
  • ऋण शोधन संचय

सामान्य संचय

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, सामान्य संचय किसी विशिष्ट उद्देश्य से जुड़ा नहीं होता। इसका उपयोग भविष्य की किसी भी आकस्मिकता अथवा अज्ञात देनदारी के लिए किया जा सकता है। सामान्य संचय का सृजन कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होता। इसका सृजन केवल उस स्थिति में किया जाता हैं जबकि पर्याप्त लाभ हो। इसे लाभ-हानि विनियोजन खाते के नाम पक्ष में दर्शाया जाता है।
इसकी विशेषताएं निम्न हैं :
  • इसका सृजन किसी उद्देश्य विशेष के लिए नहीं किया जाता बल्कि भविष्य की आकस्मिकताओं के लिए किया जाता है।
  • इसका उपयोग भविष्य की किसी भी हानि की पूर्ति के लिए किया जा सकता है।
  • इसका सृजन केवल उस स्थिति में किया जाता है, जब व्यवसाय के पास पर्याप्त लाभ हों। 
  • इसका सृजन लाभ होने की स्थिति में ही किया जाता है अर्थात यह लाभ पर निर्भर करता है।
  • इसको लाभ हानि विनियोजन खाते के नाम में दर्शाया जाता है।
  • इसके कारण केवल वितरणीय लाभ में ही कमी होती है।
इस संचय का सृजन आयगत लाभ को अलग रखकर किया जाता है। इसका उद्देश्य व्यवसाय की सामान्य वित्तीय स्थिति को सृदृढ़ करना होता है। यह किसी उद्देश्य विशेष के लिए नहीं होता। यह उन्मुक्त संचय है। यह भविष्य की सभी अदृश्य आकस्मिकताओं के विरूद्ध सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है। यह लाभांश के वितरण के लिए तुरंत उपलब्ध रहता है।
सामान्य संचय संगृहित लाभ होते हैं। यह आधिक्य का भाग होते हैं। यह लाभ में से बचाकर रखी राशि होते हैं। यदि लाभ नहीं हैं तो संचय भी नहीं होंगे। संचय अवितरित लाभ होते हैं। यह लाभों का विनियोजन हैं। प्रावधान लाभपर्व होते हैं, जबकि संचय लाभोत्तर होते हैं, लाभों को ज्ञात किए बिना कोई व्यक्ति संचय के बारे में बात नहीं कर सकता। संचय सृजन, एक अच्छी व्यावसायिक नीति मानी जाती है। संचय, व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को सढ करते हैं। संचयों का सृजन विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यह व्यवसाय विस्तार के लिए हो सकते हैं, यह लाभांश समानीकरण के लिए हो सकते हैं अथवा ऋण पत्रों या ऋणों के भुगतान के लिए हो सकते हैं। संचय का सृजन, आयगत लाभों अथवा पूंजीगत लाभों में से किया जा सकता है। पूंजीगत लाभों में से जिन संचयों का सृजन किया जाता है, वह पूंजीगत संचय कहलाते हैं तथा अन्यों को आयगत संचय कहते हैं।

पूँजीगत संचय

पूँजीगत संचयों का सृजन सामान्यतः पूँजीगत प्रकृति के लाभों में से किया जाता है। जैसे कि पूँजीगत लाभ, अंश एवं ऋणपत्रों के निर्गमन पर प्रीमियम, समामेलन पूर्व लाभ, सम्पत्तियों एवं देयताओं के पुनर्मूल्यांकन से लाभ। इसका अंशधारकों में लाभांश के रूप में वितरण नहीं किया जाना चाहिए। यह व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करने, पूँजीगत हानियों अथवा असामान्य प्रकृति की हानियों को अपलिखित करने के लिए प्रयुक्त होता है। 
इस प्रकार से पूँजीगत संचय :-
  • लाभों का विनियोजन होता है। जिसको रोकड़ लाभांश के रूप में वितरण नहीं किया जा सकता।
  • इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से (i) उद्यम एवं इसके अंशधारकों के बीच समता लेनदेनों से; (ii) व्यावसायिक सम्मिश्रण के लेखांकन समायोजनों से; (iii) विदेशी मुद्रा परिचालन लेनदेनों में अन्तर से; (iv) सम्पत्तियों के पुनर्मूल्यांकन से उत्पन्न आधिक्य से; (v) ऐसा गैर वसूल लाभ जिसको आय में सम्मिलित नहीं किया जाता है।
  • पूँजीगत संचयों के उदाहरण हैं : प्रतिभूति प्रीमियम, पूँजी शोधन संचय, व्यवसाय के विलय एवं अधिग्रहण से उत्पन्न पूँजीगत संचय, वैधानिक संचय, सम्पत्ति का पुनः मूल्यांकन संचय एवं विनिमय उतार-चढ़ाव संचय।
  • पूँजीगत संचय का सृजन पूँजीगत लाभों में से किया जाता है। पूँजीगत लाभ नियमित व्यावसायिक लाभ नहीं होते। यह उन लेनदेनों से उत्पन्न लाभ होते हैं, जो अनावर्ती होते हैं। पूँजीगत संचय, सामान्यतः लाभांश वितरण के लिए उपलब्ध नहीं होते हैं। इनको व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करने अथवा पूँजीगत हानियों की पूर्ति करने के लिए अलग से रखा जाता है।
पूँजीगत लाभों के उदाहरण निम्न हैं:-
  • स्थाई सम्पत्तियों के विक्रय से लाभ
  • समामेलन पूर्व लाभ
  • ऋणपत्रों के शोधन से लाभ
  • अंशों अथवा ऋणपत्रों के निर्गमन पर प्रीमियम
  • अंशों की जब्ती पर लाभ
  • व्यवसाय के अधिग्रहण पर लाभ
  • लाभ जो व्यवसाय की नियमित क्रियाओं से अर्जित नहीं किए गए हैं।

पूँजीगत संचय का उपयोग निम्न प्रकार से किया जा सकता है :
  • बोनस अंशों का निर्गमन
  • ख्याति का अपलेखन
  • प्रारम्भिक व्ययों का अपलेखन
  • अंशों/ऋणपत्रों के निर्गमन पर व्ययों का अपलेखन
  • समामेलन पूर्व की हानियों का अपलेखन

गुप्त संचय

कभी-कभी फर्म ऐसे संचय का सृजन करती है जिसको तुलनपत्र में नहीं दिखाया जाता। इसे गुप्त संचय अथवा छिपा संचय अथवा आन्तरिक संचय कहते हैं। यह संचय वित्तीय विवरणों में नहीं दिखाया जाता। यह व्यवसाय की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करता है, आत्मविश्वास एवं स्थिरता को बढ़ाता है। इसका सृजन बैंक, बीमा एवं वित्तीय कम्पनियों को छोड़कर अन्य संयुक्त पूँजी कम्पनियां नहीं करती।

आयगत संचय

यह संचय आयगत लाभ के उस भाग से लिए जाते हैं, जिनको नकद लाभांश के रूप में वितरित किया जा सकता है, यद्यपि इसके कुछ भाग को किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए अलग से रखा जा सकता है।

विशिष्ट संचय

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, विशिष्ट संचय का सृजन विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसका उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जाता है, जिसके लिए उसका सृजन किया गया है. अन्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं। फर्म को लाभ हो अथवा हानि, विशिष्ट संचयों का सृजन करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसकी प्रविष्टि लाभ-हानि खाते के नाम में की जाती है। इस प्रकार के संचय के उदाहरण हैं : लाभांश समतोलन संचय, निवेश उतार-चढ़ाव संचय, संयंत्र प्रतिस्थापन संचय एवं ऋण पत्रों के शोधन के लिए संचय।

इस प्रकार से इसकी विशेषताएं हैं :-
  • इसका सृजन विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है।
  • इसका उपयोग केवल उसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है, जिसके लिए इसका सृजन किया गया है।
  • चाहे लाभ हो अथवा न हो, इसका सृजन अनिवार्य है।
  • सही लाभ निर्धारण के लिए इसका सृजन आवश्यक है।
  • इसे लाभ हानि खाते के नाम पक्ष में दिखाया जाता है।
  • इसके कारण शुद्ध लाभ घट जाते हैं।
इसका सृजन भी आयगत लाभों को अलग रखकर किया जाता है। लेकिन यह विशिष्ट उद्देश्य के लिए ही होता है। यह तरन्त वितरण के लिए उपब्ध नहीं होता। उदाहरण के लिए ऋण पत्रों के शोधन के लिए सृजन किया गया संचय। देयता अवधि में यह संचय वितरण हेतु उपलब्ध नहीं होता। ऋण पत्रों के शोधन के पश्चात् यह सामान्य संचय बन जाता है। इसी प्रकार से लाभांश समानीकरण के लिए भी संचय का सृजन किया जा सकता है।

संचय कोष

जब लाभ के एक भाग को अलग रख दिया जाता है तथा व्यवसाय में इसका उपयोग किया जाता है तो यह संचय होता है। लेकिन लाभ एवं अधिशेष के भाग को अलग कर व्यवसाय से बाहर उसका निवेश कर दिया जाता हैं तो इसे संचय कोष कहते हैं। इस स्थिति में रोकी गई राशि का सुरक्षित प्रतिभूतियों में निवेश कर दिया जाता है, जिनको तुरन्त एवं सरलता से विक्रय किया जा सके। निवेश, निश्चित अवधि के लिए नहीं किए जाते। इसका उद्देश्य व्यावसायिक इकाई की वित्तीय स्थिति को सृदृढ़ करना होता है। अतः 'कोष' शब्द, संचय के व्यवसाय के बाहर किए गए निवेश को दर्शाता है। संचय कोषों का निवेश निश्चित अवधि के लिए नहीं किया जाता। इसका सृजन सदा आबंटन योग्य लाभों में से किया जाता है। संचय कोष के निवेश से प्राप्त ब्याज का पुनः विनियोग करना आवश्यक नहीं है।
वह लाभ जिसे अलग से रख लिया जाता है तथा व्यवसाय में उपयोग कर लिया जाता है, संचय कहलाता है। लेकिन लाभ के भाग को एक ओर रख लिया जाए और उसका निवेश व्यवसाय के बाहर कर दिया जाए तो इसे संचय कोष कहते हैं।
  • निवेश निश्चित अवधि के लिए नहीं होते हैं।
  • इसका सृजन सदा आबंटन योग्य लाभों में से किया जाता है।
  • संचयकोष के निवेश पर प्राप्त ब्याज का पुनः निवेश करना आवश्यक नहीं हैं।

संचित कोष

संचित कोष की स्थापना, दीर्घ अवधि ऋण अथवा देयताओं के शोधन अथवा सम्पत्तियों के प्रति स्थापन अथवा पट्टाधिकार के नवीनीकरण के लिए की जाती है। संचित कोष का निर्माण वार्षिक योगदान द्वारा किया जाता है। इस योगदान राशि का व्यवसाय के बाहर, सरलता से बिक्री योग्य प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है। निवेश पर प्राप्त ब्याज को पुन: उन्हीं प्रतिभूतियों में विनियोग कर दिया जाता है।
अतः संचित कोष हो सकता है :-
  • स्थाई सम्पत्तियों की प्रति स्थापना के लिए अथवा
  • ऋणपत्रों के शोधन अथवा ऋण के पुनर्भुगतान के लिए।
स्थाई सम्पत्तियों की प्रति स्थापना के लिए संचित कोष एक प्रावधान होता है। लेकिन ऋणपत्रों के शोधन अथवा ऋण की वापसी के लिए संचित कोष, लाभ का विनियोजन होता है। कम्पनी को संचितकोष के सृजन की आवश्यकता नहीं होती।
संचय, लाभ के विनियोजन होते हैं अर्थात् जिनमें प्रावधान एवं अन्य व्यय सम्मिलित हैं, के घटा देने पर लाभों का निर्धारण किया गया हो। संचय, अवशिष्ट आय होते हैं, जो सभी व्ययों एवं कराधान आदि के पश्चात बचे रहते हैं तथा इनपर स्वामियों अर्थात् अंशधारकों का अधिकार होता है।
  • संचित कोष निवेश, एक निश्चित अवधि के लिए होता है।
  • यह सदा आबंटन के लिए लाभ में से नहीं होता, उदाहरण के लिए सम्पत्ति के प्रति स्थापन के लिए संचित कोष, ह्रास के लिए प्रावधान होता है। इसका सृजन लाभ के न होने पर भी अनिवार्य रूप से किया जाता है।
  • संचित कोष के ब्याज को सदैव पुनः निवेश किया जाता है।
संचित कोष, वार्षिक योगदानों द्वारा निर्मित होता है। योगदानों को व्यवसाय के बाहर सरलता से बिक्री योग्य प्रतिभूतियों में निवेश कर दिया जाता है। विनियोजित राशि पर प्राप्त ब्याज को उन्हीं प्रतिभूतियों में पुनः निवेशित कर दिया जाता है।
एक संचित कोष (i) स्थाई सम्पत्तियों की प्रति स्थापना के लिए (ii) ऋणपत्रों के शोधन एवं ऋण को चुकता करने के लिए होता है। स्थाई सम्पत्ति की प्रतिस्थापना के लिए संचित कोष एक प्रावधान है। लेकिन ऋणपत्रों के शोधन एवं ऋण के चकता करने के लिए संचित कोष लाभों का विनियोजन है। संचित कोष यह दर्शाता है कि राशि का व्यवसाय से बाहर निवेश किया गया है।

संचय सृजन के सामान्य नियम

  • इसका सृजन लाभ हानि विनियोजन खाते के नाम में प्रविष्टि करके किया जाता है।
  • इसका सृजन अज्ञात देयता के भुगतान के लिए किया जाता है या फिर कम्पनी की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए या फिर लाभांश के समानीकरण के लिए।
  • संचय का सृजन व्यवसाय में लाभ होने की स्थिति में होता है।
  • इसका वितरण अंश धारकों में लाभांश के रूप में किया जा सकता है।
  • वास्तविक राशि की आवश्यकता को ध्यान में रखे बिना ही संचय का सृजन किया जाता है। केवल ऋणपत्रों के शोधन हेतु संचय सृजन के लिए एक निश्चित धनराशि एक ओर रख दी जाती है।
  • संचय का सृजन व्यवसाय की वित्तीय नीति एवं प्रबन्ध निर्णयन पर निर्भर करता है।
  • सामान्यतः यह तुलन पत्र के दायित्व पक्ष में दर्शाया जाता है, क्योंकि यह एक विशिष्ट संचय नहीं है।

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