उत्तर दक्षिण संवाद क्या है - अभिप्राय, आवश्यकता | uttar dakshin samvad

प्रस्तावना

भूगोलवेत्ताओं के अनुसार हमारी पृथ्वी दो गोलार्द्धों में विभाजित है- उत्तरी गोलार्द्ध और दक्षिणी गोलार्द्ध इस प्रकार देश, महाद्वीप एक दूसरे से भौगोलिक रूप से अलग-अलग है। यह एक दूसरे से रंग, जाति, सिद्धान्त और संस्कृति के आधार पर भी भिन्न है। परन्तु सबसे बड़ी बात है एक स्पष्ट विभाजन विद्यमान है-गरीब और अमीर के बीच का विभाजन, एक आर्थिक विभाजन जो समस्त दूसरे विभाजनों पर भारी पड़ता है।
वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मुख्यत: दो भागों में विभक्त है, 'उत्तर' जिसमें कुछ पूँजीपति देश आते हैं और, 'दक्षिण' जहाँ शामिल है बड़ी संख्या में ऐसे देश जिनकी पहचान है अपूर्ण विकास या कम विकसित। दक्षिण में रहने वाले लोग कमोवेश वंचित हैं- सिर्फ कुछ लोग ही जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कर पाते हैं- बाकी अल्पपोषित और अल्पवस्त्रधारी हैं। उत्तर और दक्षिण के बीच विषमता यहीं खत्म नहीं होती। चूंकि दक्षिण गरीब है, वह अमीर उत्तर की तुलना में शक्ति-विहीन भी है। आर्थिक गैर-बराबरी का विस्तार शक्ति के क्षेत्र में भी होता है।
शक्ति का अर्थ है आर्थिक रूप से अमीर उत्तर का गरीब दक्षिण पर राजनीतिक, प्रौद्योगिक और सैन्य प्रभुत्व। ऐसा क्यों है ? क्या यह इन देशों में प्रचलित कुछ निहित कमियों के चलते है जिससे ये देश इतने गरीब है ? यह इकाई स्वयं को इन दो मूल सवालों से संबोधित करता है। इन सवालों का उत्तर देने की कोशिश में यह इकाई उन तथ्यों पर बहस करता है, जिसे 'उत्तर-दक्षिण वार्ता' कहा जाता है।

उत्तर-दक्षिण संवाद : अभिप्राय

भौगोलिक दृष्टि से उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी अमेरिका और यूरोप को शामिल किया जाता है। इसी कारण इनको उत्तर के देशों की संज्ञा दी जाती है। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में लैटिन अमेरिकी और अफ्रीका का क्षेत्र आता है। उत्तरी गोलार्द्ध में उन्नत, समृद्ध, विकसित और औद्योगिक देश अधिक हैं जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में निर्धन, पिछड़े, विकासशील और शोषित देश अधिक है। 'उत्तर' से तात्पर्य विकसित राष्ट्रों या औद्योगिक राष्ट्रों से है, जिनकी अर्थव्यवस्था पूंजीवादी विचारधारा पर आधारित है, जिन्होंने तकनीकी एवं औद्योगिक क्षेत्र में चहुंमुखी प्रगति कर ली है, जहाँ बचत एवं पूँजी निर्माण की दर काफी ऊंची है और जहाँ राजनीतिक एवं वित्तीय स्थिरता है। इसके विपरीत, 'दक्षिण' में अधिकांशतया वे देश हैं जिन्हें 'विकासशील' अथवा तृतीय विश्व के देश कहा जाता है। इन देशों की विशेषताएं है- पूंजी की कमी, जनसंख्या विस्फोट, निर्धनता, बेरोजगारी, कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था, तकनीकी तथा वैज्ञानिक ज्ञान का अभाव।

उत्तर-दक्षिण संवाद : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अमीर और गरीब के बीच की बड़ी दरार बहुत पुरानी नहीं है, बल्कि हाल की है, जो हमें सिर्फ पिछली दो शताब्दियों में वापस ले जाती है जिसके दौरान पश्चिमी औद्योगिक शक्तियों का उदय हुआ और उन्होंने लगभग समस्त "दक्षिण" या "तृतीय विश्व" को उपनिवेश बना लिया। इन औपनिवेशिक शक्तियों ने शीघ्र ही नए दखल किए गए उपनिवेशों पर उनकी कमजोरी का लाभ उठा कर अपनी आर्थिक और राजनीतिक पकड़ को सुदृढ़ किया तथा उनकी संपत्ति को बहुत ही योजनाबद्ध शोषण और लूट शुरू कर दी। अपनी साम्राज्यवादी नीति का आक्रामक अनुसरण करते हुए, इन उपनिवेशवादी शक्तियों ने शेष विश्व के भौतिक और अन्य संसाधनों का खुद के लिए दोहन करना शुरू कर दिया। यह दोहन औद्योगिक प्रयोजना के लिए उपनिवेशों से ज्यादातर सस्ते कच्चे पदार्थ के रूप में, प्राप्त किया गया। साथ ही, ताकत का इस्तेमाल कर सस्ते श्रम का कठोरतापूर्वक शोषण किया गया। न सिर्फ यही, बल्कि, इन उपनिवेशों को औपनिवेशिक देशों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के बड़े बाजार में परिणत कर दिया गया। यह उपनिवेश साम्राज्यवादी शक्तियों की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करते थे। इस प्रकार, वह प्रक्रिया शुरू हुई जिसके द्वारा उपनिवेश की सम्पत्ति का औपनिवेशिक शक्ति की ओर निकास होने लगा। उपनिवेशों के लिए इस नीति का प्रतिफल विध्वंसकारी हुआ। उनकी अर्थव्यवस्था न सिर्फ रूक गई, बल्कि और अधिक बिगड़ गई। उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में, इन नव स्वतंत्र देशों की अर्थव्यवस्था का विकास, औद्योगिक क्रान्ति की आवश्यकताओं के अनकल, एक उपोत्पादन और एक परक के रूप में किया गया। इस प्रकार उपनिवेशवाद ने न सिर्फ"उत्तर" में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति में योगदान किया और उसकी सम्पत्ति में वृद्धि की बल्कि दूसरी ओर दक्षिण के उपनिवेशों को भूखमरी और अल्पविकास की ओर क्रमश: बढ़ाया।

अततः इन शोषित देशों में 20 वीं सदी के प्रारम्भ में उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय आन्दोलन का उदय हुआ जो एक लम्बे, दीर्घकालिक संघर्ष के बाद दूसरे विश्व युद्ध के उपरान्त राजनीतिक स्वतन्त्रता और प्रभुसत्ता प्राप्त करने में सफल हुए हैं। परन्तु यह कैसी स्वतन्त्रता थी? औपचारिक रूप से कहा जाए तो इसका अर्थ था सिर्फ राजनीतिक स्वतन्त्रता। इस प्रकार की स्वतन्त्रता में कोई आर्थिक दृत्व नहीं था उनकी अर्थव्यवस्था सदियों की लूट और शोषण से लुंज-पुंज थी। सबसे बुरा तो यह था कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए और स्वतंत्रता को सच्चा अर्थ प्रदान करने के लिए न पूंजी थी और न ही प्रशिक्षित मानव शक्ति। नव स्वतंत्र देशों को अमीर, औद्योगिक देशों पर आर्थिक और प्रौद्योगिक संसाधनों के लिए निर्भर रहने के लिए विवश होना पड़ा। इस कमजोरी ने एक बार फिर उत्तर के अमीर देशों को उनके शोषण के लिए नया अवसर दिया, यद्यपि इस बार अधिक सुक्ष्म तरीके से। उपनिवेशवाद की जगह "नव-उपनिवेशवाद" आ गया।

इस दौर में उत्तर, दक्षिण पर व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में अपनी शर्तों को आरोपित करता है। व्यापार और अन्य आर्थिक संबंधों में गैर-बराबरी है जो उत्तर के पक्ष में जाता है। व्यापार की शर्ते और अन्य आर्थिक सम्बन्ध उत्तर के पक्ष में और उसके अनुकूल है।

नव-उपनिवेशवाद का कुल परिणाम है दक्षिणी देशों में अल्पविकास का जारी रहना। इसलिए यह कहने की जरूरत नहीं है कि, "दक्षिण" के देशों की परेशानियों के लिए बहुत हद तक अमीर औद्योगिक शक्तियाँ उत्तरदायी है। तृतीय विश्व के देश स्वयं को एक बड़े घेरे में पाते हैं। उनके औपनिवेशिक भूत ने उन्हें गरीब, वंचित और अस्थिर बनाया और आज वह अपने भूत के कारण खुद के आधार पर खड़े होने में असमर्थ हैं। और जब तक वह खुद का विकास नहीं कर पाते, वह "उत्तर" के अमीर देशों से अपने संबंध में हरदम घाटे में रहेंगे। परन्तु, दक्षिण का विकास एक दूर की संभावना रहेगी जब तक कि "उत्तर" गरीब के साथ एक नए, बराबरी के सम्बन्ध की स्थापना नहीं करता। इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर, 'उत्तर-दक्षिण' का भूत, वर्तमान और भविष्य एक दूसरे से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है।

उत्तर-दक्षिण संवाद की आवश्यकता

उत्तर और दक्षिण के बीच बातचीत का केन्द्र बिन्दु है नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सृष्टि । नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकता इसलिए अनुभव की गई चूंकि विद्यमान अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का ढांचा विश्व समुदाय के बड़े उद्देश्य को पूरा करने में असफल रहा है और सिर्फ उन्हीं (उत्तर) के हितों की पूर्ति करने में लगा है जिन्होंने उसे बनाया। वर्तमान अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य स्तंभ, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), पुननिर्माण और विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक (IBRD) जिसे आम तौर पर विश्व बैंक के रूप में जाना जाता है और सीमा शुल्कों तथा व्यापार पर आम सहमति (GATT), संयुक्त राज्य अमेरिका के बेटनवुड्स में हुए एक सम्मेलन की उपज थे। ब्रेटनवुड्स व्यवस्था मूलरूप से एक पाश्चात्य व्यवस्था बन गई चूंकि उस वक्त वर्तमान विकासशील देशों में से अधिकांश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। सोवियत संघ ने ब्रेटनवुड्स व्यवस्था का अंग बनने से इंकार कर दिया और बदले में पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए अपना खुद का ढांचा कोमेकान (COMECON) खड़ा किया। परिणामस्वरूप ब्रेटनवुड्स की वित्तीय संस्थाओं द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और विकास के प्रबंध के प्रावधानों को पाश्चात्य हितों के अनुकूल बनाया गया जिसमें विकासशील देशों के हितों को नजरअंदाज किया गया। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में, जिसकी स्थापना भुगतान-संतुलन की जरूरत की पूर्ति के लिए अल्प-अवधि ऋण देने के लिए हुई, निर्णय लेने का अधिकार अमेरिका जैसे अमीर देशों के पास रहा जो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों में बड़ा योगदान देते थे। उन्हें उनके वित्तीय योगदान के अनुपात में वोटों का भाग मिला। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में अधिक वोट देने के अधिकार का प्रयोग विकासशील देशों को ऋण देने के निर्ण निषेधाधिकार के रूप में किया जाने लगा। विकासशील देशों को मिले निम्नतर वोट के अधिकारों के कारण यह देश अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्णयों में शायद ही कोई हस्तक्षेप रख पाए। साथ ही, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से लिया गया, कोई भी बड़ा उधार खास शर्तों पर आधारित था जिसे उधार लेने वाले देश को पूरा करना था। बहुत बार इन शर्तों का अर्थ होता था उधार लेने वाले देश की राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों में सीधा हस्तक्षेप। यह शर्ते उधार लेने वाले देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाने की थी जिससे कि इनका बाजार उत्तर के बहुराष्ट्रीय निगमों की लागतों के लिए खोला जा सके। यह उधार लेने वाले देशों की राष्ट्रीय प्रकृति के विपरीत जाता है जो अपनी अर्थव्यवस्था को गैर-पूंजीवादी मार्ग पर विकसित करना चाहते थे जिससे कि अर्थव्यवस्था का संतुलित विकास हो सके। इसी प्रकार विश्व बैंक से आशा की जाती थी कि वह दीर्घकालिक आधार पर उधार लेने वाले देशों की विभिन्न परियोजनाओं को सहायता दे। यहां भी, प्रत्येक परियोजना की व्यवहार्यता और दुरूस्ती को विश्व बैंक द्वारा अनुमोदित किया जाना था, जिसमें निर्णय करने का अधिकार मुख्यतः उत्तर के देशों के पास था। इसके आगे, विश्व बैंक उधार लेने वाले देशों के निजी क्षेत्र में लागत को प्राथमिकता देकर "मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था" की प्रवृति को भी बढ़ावा देने की कोशिश करता है । अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा अपनायी गई उधार देने की नीतियों का कुल प्रभाव द्विस्तरीय है, यथा, यह घाटे में चलने वाले देशों की सम्पूर्ण आर्थिक नीतियों को प्रभावित करती है और दूसरा, यह एक खास तरह के विकास का पक्षपाती है (निजी, मुक्त बाजार)।
इस प्रकार यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि कैसे अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का वर्तमान ढांचा भेदभावपूर्ण है और इसलिए, उसमें ढांचागत् और मूलभूत परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

उत्तर-दक्षिण संवाद के मंच

समय-समय पर उत्तर-दक्षिण संवाद के प्रयत्न किये गये। इन प्रयत्नों के माध्यम से इनके बीच विवाद के विविध प्रसंगों पर खुलकर चर्चा हुई और दोनों पक्षों को एक दूसरे का दृष्टिकोण जानने का अवसर प्राप्त हुआ। दोनों पक्षों में सहयोग और विश्वास का वातावरण विभिन्न सम्मेलनों के माध्यम से बना। ऐसे उदाहरणों में पेरिस सम्मेलन, (1975), ब्रांट आयोग, (1977), कानकुन सम्मेलन, (1981), तथा उरूग्वे वार्ता (1986-94), पृथ्वी सम्मेलन (1992-1997) एवं अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन को प्रमुख रूप से गिनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त समय-समय पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों द्वारा उत्तर-दक्षिण संवाद स्थापित किये जाने की भावना का आह्वान किया जा रहा है। इनमें मुख्य प्रयासों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार है

पेरिस सम्मेलन, 1975
महासभा द्वारा नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की घोषणा के एक वर्ष में ही संयुक्त राज्य अमरीका ने अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के बारे में सम्मेलन बुलाए जाने की दिशा में पहल प्रारम्भ कर दी और यह दिसम्बर, 1975 में पेरिस में आरम्भ हुआ। पेरिस सम्मेलन को 'अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग सम्मेलन' के नाम से भी जाना जाता है। इस सम्मेलन के आयोजन में तत्कालीन अमरीकाी विदेश सचिव डॉ. हेनरी किसिंजर ने विकसित और विकासशील देशों का सम्मेलन आयोजित करने का आह्वान किया। कुल 8 विकसित और 19 विकासशील देशों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। इस सम्मेलन का विचार-विमर्श बीच-बीच में रूक कर हुआ और करीब 18 महीने तक चलता रहा। सम्मेलन जून, 1977 में समाप्त हुआ। उत्तर के समृद्ध देशों ने निधन देशों (दक्षिण के देशों) के लिए कछ रियायतें और सहायता कार्यक्रमों की घोषणा की जिनमें गरीब देशों की तेल की आवश्यकताओं पर बढ़ते खर्च को देखते हुए और जिंस मूल्यों को स्थिर करने में मदद के लिए गरीब देशों की सहायता के उद्देश्य से एक विशेष कोष की स्थापना करना भी शामिल था। इसके बदले में 1973 के कथित तेल संकट की मार से पीड़ित औद्योगिक देशों ने स्थिर मूल्यों पर तेल की सप्लाई की गारण्टी की मांग रखी । देखा जाए तो उत्तर के धनी देश थोड़ी-सी सहायता का बड़ा मूल्य मांग रहे थे, अतः तेल निर्यातक देशों ने इसे सीधे अस्वीकार कर दिया और इस प्रकार पेरिस सम्मेलन अर्थशून्य या विफल हो गया।

ब्रांट आयोग, 1977
1970 के दशक ने उत्तर-दक्षिण वार्ता में सीधा टकराव देखा। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए गए। दक्षिण ने बहुपक्षीय मदद, सरकारी विकास में सहयोग में उत्तर द्वारा भारी कटौती की शिकायत की जबकि उत्तर ने दक्षिण को “आधारहीन गढ्ढा" कहा जिसमें हस्तान्तरित संसाधन की लगातार फिजुल खर्ची हो रही थी। इसका परिणाम हुआ संवाद में पूर्ण गतिरोध। नए आधारों की खोज करना आवश्यक था। इन परिस्थितियों में, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने "अन्तर्राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर स्वतन्त्र कमीशन" का गठन पश्चिमी जर्मनी के भूतपूर्व चांसलर क्लिो ब्रान्ट के नेतृत्व में किया। उत्तर-दक्षिण मुद्दों के गहन परीक्षण के बाद, ब्रान्ट कमीशन ने 1980 में "उत्तर-दक्षिण : उत्तर जीविता का एक कार्यक्रम" का प्रकाशन किया। इस कमीशन द्वारा दी गई सलाह की दिशा, पूर्ववर्ती दिशा से भिन्न थी। इसने "नीतियों की सार्वभौमिकता" का आह्वान किया। आयोग ने जोर देकर यह स्पष्ट किया था कि विश्व शान्ति के लिए विकसित और विकासशील देशों में 'परस्पर निर्भरता' की आवश्यकता है। इसके लिए आयोग ने 'विश्व के नेताओं की अनौपचारिक बैठक' बुलाने का प्रस्ताव किया ताकि विकसित और विकासशील देशों के बीच विभाजन से सम्बद्ध मुद्दों, जैसे सहायता, व्यापार, वित्तीय प्रवाह, सुरक्षा, टैक्नोलॉजी का स्थानान्तरण और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक जैसे अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का लोकतनीकरण के बारे में रियायतें, आदि पर स्पष्ट और निर्भीक विचार-विमर्श किया जा सके।

कानकुन सम्मेलन, 1981
ब्रांट कमीशन रिपोर्ट ने विश्व नेताओं की ऐसी शिखर वार्ता की सलाह दी थी, जो विश्व की वर्तमान समस्याओं और उनके संभावित हलों पर एक नया संकेद्रण, और एक नयी रोशनी डाल सके। इस सोच के साथ, 1981 के अक्टूबर में कानकुन, मैक्सिको में, एक शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें 22 राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया। विकासशील देशों ने इस बात पर जोर दिया कि विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ढांचे में व्यापक परिवर्तन किया जाए ताकि बदलती परिस्थितियों में वे अपने दायित्व का अच्छी तरह पालन कर सकें। इस प्रस्ताव का अमीर देशों ने कड़ा विरोध किया और अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के दबाव पर विचार-विमर्श के लिए कोई प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। राजनीतिक नेताओं का उत्तर-दक्षिण मुद्दों पर एक दूसरे के दृष्टिकोण को जानने का यह एक अनौपचारिक मिलन था। फिर भी, शिखर वार्ता के नेताओं को अन्तर्राष्ट्रीय और हितों की परस्परता का और साथ ही भोजन, विद्युत और संसाधनों के हस्तांतरण के क्षेत्र में भी कार्य योजना की भारी आवश्यकता अनुभव की गई परन्तु इन आम समस्याओं के आगे ठोस रूप में कानकुन शिखर वार्ता बहुत आगे कुछ न कर पायी। रीगन ने बाजार के जादू के अपने शब्दाडम्बर को दुहराया तथा इसकी शक्तियों और निजी पूंजी को विकासशील देशों की समस्याओं का समाधान बताया। इस दृष्टिकोण को दक्षिण के नेताओं ने चुनौती दी जिनके अनुसार विकासशील देशों की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को बाजार की शक्तियाँ हानि पहुंचाएंगी। संसाधनों के हस्तांतरण के निर्णायक सवाल पर विकसित देशों ने कोई वचन नहीं दिया जैसा ब्रान्ट रिपोर्ट में विचार किया गया था।

इस प्रकार, जहाँ तक उत्तर-दक्षिण वार्ता में ठोस मुद्दों का सवाल है, कानकुन सम्मेलन एक निरर्थक प्रयास बन गया। अगर इस सम्मेलन को कुछ सफलता मिली तो वह यह कि अमीर उत्तर के प्रतिनिधियों ने दक्षिण के पक्ष को शान्ति से सुना। कानकुन से, विश्वस्तरीय बातचीत को प्रारम्भ करने जैसी बड़ी आशा मिथ्या सिद्ध हुई।

उरूग्वे वार्ता, 1986-93
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् अस्तित्व में आई अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था मुख्यतः तटकर और व्यापार से सम्बन्धित सामान्य समझौते के प्रावधानों द्वारा संचालित होती है। इस सामान्य समझौते को 'गैट' (General Agreement on Tarihhs and Trade-GATT) कहते हैं । विश्वस्तरीय व्यापार के सम्बन्ध में नियम बनाने का कार्य गैट' संस्थान गैट' का मख्य उद्देश्य प्रशल्क दरों को न्यनतम करना तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास में आने वाली कठिनाइयों का निराकरण करके पारस्परिक लाभ वाले लक्ष्यों को प्राप्त करना है। गैट की स्थापना से लेकर अब तक आठ बहुपक्षीय व्यापारिक सम्मेलन हो चुके हैं। आठवां अधिवेशन 20 सितम्बर, 1986 को गैट' के तत्वावधान में दक्षिण अमरीका के देश उरूग्वे में प्रारम्भ हुआ जिसमें लगभग सौ सदस्य देशों ने भाग लिया था। उरूग्वे वार्ता दौर के लिए चार वर्षों की अवधि निर्धारित की गयी थी। और गैट को अपने निष्कर्ष दिसम्बर 1990 तक देने थे। लेकिन 4 वर्षों के निरन्तर प्रयासों और वार्ताओं के बावजूद भी कतिपय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्थाओं पर आम सहमति प्राप्त करने में सफलता नहीं मिल सकी।

उरूग्वे वार्ता के वर्तमान दौर में गत परम्परा से हटकर वार्ता क्षेत्र में विस्तार किया गया तथा पहली बार वार्ता सूची में चार नए क्षेत्रों को शामिल किया गया। यह क्षेत्र हैं- 1. व्यापार से सम्बन्धित निवेश उपाय, 2. बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार के पहलुओं से सम्बन्धित व्यापार 3. सेवाओं में व्यापार तथा 12. कृषि। गैट वार्ता सूची में यह क्षेत्र विकसित देशों के आदेश से शामिल किए गए। विकासशील देशों का विचार था कि गैट केवल अब तक के परम्परागत क्षेत्र में ही नियम बनाने दक अपनी कार्यवाही सीमित रखे। वार्ता सूची के विस्तार के विषय में विकसित देशों (उत्तर) के अपने तर्क थे। उनके अनुसार व्याणर से सम्बन्धित निवेश उपायों को वार्ता सूची में रखा जाना चाहिए क्योंकि विकासशील देश (दक्षिण) विदेशी निवेश को नियन्त्रित करने की नीतियाँ बनाते हैं जिससे विदेशी कम्पनियों को स्वतन्त्रता से व्यापार करने में बाधा पड़ती है। बौद्धिक सम्पदा अधिकारों, विशेषकर पेटेन्ट, कापीराइट तथा ट्रेडमार्क के सम्बन्ध में विकसित देशों का कहना था कि विकासशील देशों में उपर्युक्त अधिकारों के अपर्याप्त संरक्षण के कारण जाली तथा चोरी के व्यापार का प्रचलन हुआ है और वैध व्यापार को क्षति पहुंची है, अतः बौद्धिक सम्पदा अधिकार से सम्बन्धित व्यापारिक पहलुओं को वार्ता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। विकासशील देशों ने ऐसे प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया।

उरूग्वे चक्र में पांच वर्ष के वार्ता दौर के पश्चात् भी किसी सर्वसम्मत परिणाम पर पहुंचने में असफल होने पर गैट के महानिदेशक आर्थर डुंकेल ने 20 दिसम्बर 1991 को 108-सदस्यीय गैट के भावी स्वरूप पर 500 पृष्ठ के अपने प्रस्ताव रखे। सदस्य राष्ट्रों को सहमति के लिए पहले 13 जनवरी, 1992 तक का समय दिया गया। बाद में इस समय सीमा को 17 अप्रैल, 1992 तक बढ़ा दिया गया।

विकासशील देशों (दक्षिण) की दृष्टि में डुंकेल प्रस्तावों का सर्वाधिक ऋणात्मक पहलू यह है कि वह केवल व्यापार तक ही सीमित नहीं है, इनमें कृषि सब्सिडी, बौद्धिक सम्पदा अधिकार (पेटेन्ट, कापीराइट, ट्रेडमार्क आदि) विदेशी निवेश उपायों तथा सेवाओं को भी शामिल कर लिया गया। इस प्रस्ताव में विकासशील देशों की मागों तथा आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया केवल विकसित देशों के व्यापार प्रसार तथा हितों को ही आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। डुंकेल प्रस्तावों में सर्वाधिक विरोध पेटेन्ट अधिकारों के सम्बन्ध में था जिनमें पेटेन्ट प्राप्त कर्ताओं के अधिकारों में वृद्धि और उनके दायित्वों एवं वैधानिक बन्धनों में कमी की गयी। कृषि के क्षेत्र में पेटेन्ट अधिकार लागू करने की सिफारिश की गयी जिसके लागू हो जाने की दिशा में विकासशील देशों को विकसित देशों से कृषि सम्बन्धी तकनीकी खरीदने के लिए भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा। संक्षेप में, कुंकेल प्रस्तावों को स्वीकार कर लेने से विकासशील देशों के विकास उद्देश्यों पर मूलरूप में विपरीत प्रभाव पड़ेगा। आर्थर डुंकेल ने ऐसे नए नियम प्रतिपादित किए जिनसे "गैट" विकासशील देशों पर ऐसी नीतियाँ थोप सकेगा कि वह अपने विकास उद्देश्यों को प्राप्त करने में असमर्थ हो जाएंगे।

गैट के अधिवेशनों में विकासशील देशों ने अपने व्यापारिक हितों की ओर ध्यान आकर्षित किया तथा प्रशुल्क कटौती एवं विकसित देशों के प्रतिबन्धात्मक व्यवहार के विरूद्ध इन्होंने अपनी आवाज बुलन्द की। दुर्भाग्यवश, गैट के विभिन्न सम्मेलनों में इन राष्ट्रों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार ही हुआ और औद्योगिक राष्ट्रों के हितों का ही गैट के अन्तर्गत वर्चस्व स्वीकार किया गया। उत्तर के राष्ट्र अपनी समृद्धशाली स्थिति के कारण अपने राजनीतिक हित सुरक्षित कर लेते हैं तथा फलतः आर्थिक हित सिद्ध करने में भी सफल हो जाते हैं। इसलिए 'गैट' को 'अमीरों के क्लब' की संज्ञा दे दी जाए तो उचित ही होगा।

पृथ्वी सम्मेलन, 1992-1997
रियो दि जैनेरो (ब्राजील) में आयोजित 'पृथ्वी शिखर सम्मेलन' (3 जून से 14 जून, 1992) उत्तर और दक्षिण (अमीर एवं गरीब) के देशों में पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर मतभेद का एक महत्त्वपूर्ण दृश्य प्रस्तुत करता है। विकसित देश (उत्तर) मानते हैं कि गरीबी और जनसंख्या विस्फोट के कारण ही पृथ्वी की यह स्थिति हुई है। दक्षिण के गरीब देशों में अभी भी उष्णकटिबन्धीय घने जंगल है और अंदेशा है कि अपनी बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए वे इन जंगलों का सफाया कर सकते है। विकासशील देशों के अनुसार पश्चिमी देशों की बेलगाम फिजुलखर्ची से ही पृथ्वी प्रदूषित हुई है। ऊर्जा के स्रोतों के अति दोहन को वे पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख कारण मानते हैं ।
रियो सम्मेलन से पूर्व छः मुद्दे उभर कर सामने आये, जिन पर उत्तर-दक्षिण में मतभेद था-

(1) ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन - उत्तर के देश 2000 ई. तक कार्बन डाई आक्साइड और मिथैन जैसी गैस के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत कटौती चाहते थे, जबकि दक्षिण के गरीब देश पिछले 50 वर्षों से गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन के लिए अमीर देशों को दोषी करार देते हैं और इसमें भारी कटौती चाहते है।

(2) वन - अमीर देश ऐसी कानूनी बाध्यता चाहते है जिससे वनों, खास कर उष्ण कटिबन्धीय वनों की कटाई पर कड़े प्रतिबन्ध लगें। गरीब देशों के अनुसार ऐसे प्रावधान राष्ट्र की प्रभुसत्ता में हस्तक्षेप माना जाएगा। वनों को अब तक हुए नुकसान की भरपाई मुख्य रूप से अमीर देश करें।

(3) जनसंख्या - उत्तर के अमीर देश पर्यावरण के निरन्तर विनाश के लिए जनसंख्या विस्फोट और गरीबी को उत्तरदायी ठहराते है जबकि दक्षिण के देश अमीर देशों पर संसाधनों के अत्यधिक उपभोग का आरोप लगाते है । उनके अनुसार मुट्ठी भर होने के बावजूद ये देश विश्व के कुल संसाधनों का 75 प्रतिशत से अधिक भाग का उपभोग करते हैं।

(4) तकनीकी हस्तान्तरण - अमीर देश तकनीकी विकास को व्यावसायिक मानते है और जो देश इसका इस्तेमाल करेंगे उनसे इनका पूरा मूल्य मुनाफे सहित वसूल की जानी चाहिए। गरीब देश तकनीकी का प्रयोग प्रदूषण को साफ करने और ऊर्जा क्षमता में सुधार के लिए करना चाहते है और पाहते है कि यह तकनीक गरीष देशों को सस्ती दर पर मिले।

(5) अनुदान - अमीर देश पर्यावरण सुधार के लिए अनिवार्य अनुदान नहीं देना चाहते, उनके अनुसार संयुक्त राष्ट्र एजेंसियाँ विश्व पर्यावरण एजेंसी या विश्व बैंक अनुदान का वितरण करें। गरीब देश पर्यावरण सुधार पर खर्च के लिए नई संस्था का निर्माण चाहते है क्योंकि वर्तमान विश्व बैंक पर अमीर देशों का नियन्त्रण बना हुआ है।

(6) पर्यावरण विनाश- अमीर देश औद्योगिकरण और गरीबी को पर्यावरण के विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं और खर्च का बोझ बांटना चाहते हैं जबकि गरीब देशों के अनुसार पर्यावरण के विनाश के लिए विकसित देश ही उत्तरदायी रहे हैं और अब पर्यावरण को स्वच्छ करने का पूरा व्यय वहन करें।

रियो में 3 जून से 14 जून, 1992 तक चलने वाला संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण तथा विकास सम्मेलन तीन प्रमुख दस्तावेजों को मान्य करने के बाद सन्तोष और आशा के वातावरण में सम्पन्न हो गया। इस महासम्मेलन में 178 राष्ट्रों की ओर से 115 राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष उपस्थित थे। इसमें (1) एजेण्डा 21 आगामी शताब्दी के लिए विकास तथा पर्यावरण सुधार योजना, (2) 27-सूत्री रियो घोषणा-पत्र था, (3) विश्व के वनों के संरक्षण सम्बन्धी वक्तव्य प्रमुख उपलब्धियाँ हैं । एजेण्डा 21 के लिए पर्याप्त कोष जुटाने जैसे विवादास्पद प्रश्न पर भी सहमति बन सकी, यह सन्तोष की बात है।

पृथ्वी सम्मेलन से यह बात स्पष्ट हो गयी कि गरीब (दक्षिण) देशों में अपने भविष्य के प्रति चेतना उत्पन्न हुई और इस सम्मेलन में वह मुखर भी हुई। सर्वाधिक विवादास्पद मुद्दा यह था कि पर्यावरण को शुद्ध करने का आर्थिक भार कौन उठाए । एक विचार आया कि जिन देशों की जीवन शैली पर्यावरण को दूषित करने के लिए उत्तरदायी है वे अपने व्यवहार में संयम बरतें। उदाहरण के लिए, अमरीका पर यह आरोप था कि वह सर्वाधिक कार्बन उगलता है, अतः उसे अपना कदम पीछे ले जाना चाहिए। इसी तरह एक मुद्दा यह उठाया गया कि जंगलों को सार्वभौम सम्पदा न मानकर स्थानीय सम्पदा माना जाए। इस मुद्दे को सबसे ज्यादा मुखर से भारत के मन्त्री कमलनाथ ने उठाया। उनका कहना था कि यदि जंगलों को सार्वभौम सम्पदा माना जाए तो क्रूड आयल को भी सार्वभौम सम्पदा माना जाए क्योंकि इसका उपयोग सम्पूर्ण मानव जाति के लिए होता है।

सम्मेलन का कुल मिलाकर यह प्रभाव रहा कि गरीब देश पर्यावरण को दूषित करने के परिणामों के प्रति सजग हो उठे। उनकी चिन्ता अब यह है कि पर्यावरण के नाम पर भावी विकास के कामों पर अमीर देशों का दबदबा
न बड जाए। 

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन
जून, 1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वावधान में वियना में अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन आयोजित हुआ। अमरीका तथा यूरोपीय देश चाहते थे कि सम्मेलन मानवाधिकार आयुक्त की नियुक्ति करे जिससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों की जाँच की जा सके, लेकिन विकासशील देशों का कहना था कि इस प्रकार के आयुक्त की नियुक्ति यदि की गई तो इससे उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। 

सारांश

उत्तर-दक्षिण संवाद, मोटे तौर पर एक बेहतर विश्व की दिशा में परिवर्तन का संवाद है जिसमें पूरा विश्व समुदाय एक दूसरे के साथ बराबरी के आधार पर और एक जैसी परिस्थितियों में मेल से रह सकें। यह एक संवाद है जो इतिहास द्वारा निर्मित विशेषाधिकार प्राप्त और वंचितों के बीच खड़े किए गए अवरोधों को धराशायी करना चाहता है। यह ऐतिहासिक गलतियों को सुधारना चाहता है और विकास में तमाम देशों के लिए बराबरी को पक्षधर है। परन्तु यह किसी दूसरे के मूल्य पर ऐसा नहीं करना चाहता। बल्कि, यह संवाद उच्चतर आकांक्षाओं द्वारा प्रेरित है। यह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए एक नई विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने की बात करता है। यह तभी किया जा सकता है जब संवाद में शामिल दोनों पक्ष, उत्तर और दक्षिण, इस मूल तथ्य को समझें।

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